एक ऐसा मंदिर जहाँ ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति नहीं करता है पूजा-अर्चना,जानिए ...........

ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली माँ कुष्माण्डा।


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नवरात्रि में चौथे दिन देवी को माँ कुष्माण्डा के रूप में पूजा जाता है। माँ दुर्गा का चौथा स्वरूप हैं माँ कुष्माण्डा।जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था,तब इन्हीं देवी ने अपने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी।इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा जाता है।इनकी मंद व हल्की हँसी के द्वारा ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्माण्डा नाम से अभिहित किया गया है। सृष्टि की रचना के बाद उसमें प्रकाश भी इन्हीं के कारण आया है,इसीलिए ये सूर्यलोक में निवास करती हैं।

कुष्माण्डा देवी मंत्र:-

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु मे।।

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अर्थ-  जो कलश मदिरा से भरा हुआ है, रुधिर अर्थात रक्त से लथपथ है। ऐसे कलश को माँ भगवती ने अपने दोनों कर कमलों में धारण किया है। ऐसी माँ कुष्माण्डा मुझे शुभता अर्थात कल्याण प्रदान करें।

माँ कुष्माण्डा का स्वरूप:-

कुष्माण्डा देवी को आठ भुजायें हैं,जिनमें कमंडल, धनुष-बाण,कमल पुष्प, शंख, चक्र,गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। देवी माँ के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में कलश भी है,जो सूरा से भरा हुआ है और रक्त से लथपथ है। इनका वाहन सिंह है और इनके इस स्वरूप की पूजा करने पर भय से मुक्ति मिलती है। इन भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है।माता कुष्माण्डा सिंह पर सवार होती हैं।

पिण्ड के रूप में लेटी माँ, चरणों से करती हैं अमृत वर्षा,जो जल है अत्यंत फायदेमंद आँखों के लिए :-

कानपुर, उत्तरप्रदेश से करीब 40 किलोमीटर दूरी पर घाटमपुर तहसील में माँ कुष्माण्डा का मंदिर है। यह मंदिर लगभग 1000 साल पुराना है। इसकी नींव सन 1380 में राजा घाटमदेव जी रखी थी।इसमें एक चबूतरे में माँ की मूर्ति लेटी थी। सन 1890 में घाटमपुर के कारोबारी चंदीदीन भुर्जी ने मंदिर का निर्माण करवाया था। यह बहुत ही प्राचीन मंदिर है।

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एक पिंड के रूप में लेटी हुई माँ कुष्माण्डा की प्रतिमा से लगातार पानी रिसता रहता है और जो भक्त उस जल को ग्रहण करता है उसका जटिल से जटिल रोग दूर हो जाता है। हालांकि यह अभी तक रहस्य बना हुआ है कि पिण्डी से जल कैसे निकलता है। कई वैज्ञानिकों ने शोध किया, लेकिन माँ के इस चमत्कार को खोज नहीं पाए।

अनोखा मंदिर जहाँ सिर्फ़ माली कराते हैं पूजा-अर्चना

माँ कुष्माण्डा देवी मंदिर में पुजारी कोई पण्डित नहीं है बल्कि माली ही पूजा कराते हैं। यहाँ दसवीं पीढ़ी के पुजारी माली श्री गंगाराम जी हैं जो माता रानी के दरबार में पूजा-पाठ करवाते हैं। सुबह स्नान-ध्यान कर माता रानी के पट खोलना, पूजा-पाठ के साथ हवन करना प्रतिदिन का काम है। मनोकामनाएं पूरी होने पर जो भक्तगण आते हैं, हवन पूजन करवाते हैं।

पूजा का महत्व :-

देवी कुष्माण्डा भय दूर करती हैं। जीवन में सभी तरह के भय से मुक्त होकर सुख से जीवन बिताने के लिए ही देवी कुष्माण्डा की पूजा की जाती है। देवी कुष्माण्डा की पूजा से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। इनकी पूजा से हर तरह के रोग, शोक औऱ दोष दूर हो जाते हैं। किसी तरह का क्लेश भी नहीं होता है। कुष्माण्डा देवी की पूजा से समृद्धि और तेज प्राप्त होता है।

लोककथा :-

श्री गंगाराम जी ने बताया कि करीब एक हजार साल पहले घाटमपुर गाँव जंगलों से घिरा था। इसी गाँव का एक ग्वाला कुढ़हा गाय चराने के लिये आता था। शाम के वक़्त जब वह घर जाता औऱ गाय से दूध निकालता तो गाय एक बूंद दूध नहीं देती। उसको शक हुआ औऱ उसने छिप कर देखा कि गाय एक स्थान पर सारा दूध गिरा देती है। ग्वाले ने उस स्थान पर जाकर प्रणाम किया तभी माँ ने प्रकट होकर ग्वाला से कहा कि मैं माता सती का चौथा अंश हूँ। ग्वाले ने यह बात पूरे गाँव को बताई औऱ उस जगह खुदाई की गई तो माँ कुष्माण्डा देवी की पिंडी निकली। गांववालों ने पिंडी की स्थापना वहीं करवा दी औऱ माँ की पिंडी से निकलने वाले जल को प्रसाद स्वरूप मानकर पीने लगे।

शिव महापुराण के अनुसार कथा:-

माता कुष्माण्डा की कहानी शिव महापुराण के अनुसार, भगवान शंकर की पत्नी सती के मायके में उनके पिता राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया था। इसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था, लेकिन शंकर भगवान को निमंत्रण नहीं दिया गया था। माता सती भगवान शंकर की मर्जी के खिलाफ उस यज्ञ में शामिल हो गईं। माता सती के पिता ने भगवान शंकर को भला-बुरा कहा था, जिससे आक्रोशित होकर माता सती ने यज्ञ में कूद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी। माता सती के अलग-अलग स्थानों में नौ अंश गिरे थे। माना जाता है कि चौथा अंश घाटमपुर में गिरा था। तब से ही यहीं माता कुष्माण्डा विराजमान हैं।

प्रसाद में पुआ, गुड़ और चना चढायें:-

श्री गंगाराम जी ने के अनुसार यदि कोई भक्त सूर्योदय से पहले स्नान कर छह: महीने तक इस नीर का इस्तेमाल किसी भी बीमारी में करे तो उसकी बीमारी शत प्रतिशत ठीक हो जाती हैं। साथ ही नवरात्रि में हर रोज भक्त माँ के दरबार में हाज़िरी लगाएँ और प्रसाद स्वरूप पुआ, गुण और चना चढ़ाए, कुष्माण्डा माता भक्त की हर मनोकामना पूरी कर देती हैं।
देवी माँ को लाल वस्त्र, लाल पुष्प, लाल चूड़ी भी अर्पित करना चाहिए। देवी योग-ध्यान की देवी भी हैं। देवी का यह स्वरूप माँ अन्नपूर्णा का भी है। उदराग्नि को शान्त करती हैं। पूजन के बाद देवी के मंत्र का जाप करें।

फूलनदेवी और ददुआ भी माँ के थे भक्त :-

श्री गंगाराम जी ने बताया कि फूलन देवी भी माँ के दरबार मे नवरात्रि में एकदिन के लिये जरूर आती थी। फूलनदेवी ने आत्मसमर्पण की बात भी माँ के दरबार में कही थी। आज भी फूलनदेवी के माँ के दरबार में बाँधे घण्टे गवाही देते हैं। वहीं तकरीबन तीस सालों तक बीहड़ का शेर रहा ददुआ भी माँ का भक्त था। वह हर नवरात्रि को माता रानी के दर्शन करने करने के लिये आता था और कन्याओं को भोज कराता था।

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1 comment:

Nitish Tiwary said...

बहुत सुंदर जानकारी। जय माता दी।

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