Blog Archive

Friday, March 13, 2020

Nawazuddin Siddiqui के संघर्ष की दास्ताँ, जो आएगी आपके काम।

An Inspirational Story of Nawazuddin Siddiqui.


नवाजुद्दीन सिद्दीकी के संघर्ष की कहानी।


20 साल पहले मैं खड़ा हुआ था एक ऑफिस में जाकर तो मुझसे पूँछा गया था कि "क्या है ?"
मैंने कहा," एक्टर हैं।"
बोले दिखने से तो लगते नहीं हो कि एक्टर हो।

Pic Credit:- Google

फ़िल्म इंडस्ट्री में हमेशा से ये प्रचलन था कि एक्टर जो होता है वो 6 फुट का होता है और लम्बा-चौड़ा और डोले-शोले होते हैं। मतलब हम तो ऐसे ही चले गए थे ऐसा वो असिस्टेंट डायरेक्टर समझता था। और मैं आपको यकीन दिलाना चाहता हूँ कि मेरे खुद के रिश्तेदारों ने भी मुझे हतोत्साहित(Demoralize) किया जब मैंने उनसे इक्षा जाहिर की ,कि मैं एक्टर बनना चाहता हूँ। रिश्तेदार बोले कि पहले शक़्ल तो देख ले अपनी। सब का यही सोंचना था कि 5 फुट का दुबला-पतला और काला-कलूटा आदमी कैसे एक्टर बन सकता है। ये सच भी है, उस वक़्त हर किसी के जेहन में यही बात थी।
मुझे खुद नहीं पता था कि फ़िल्म इंडस्ट्री में मेरा क्या होगा लेकिन एक ज़िद थी और इसी ज़िद ने हौसला दिया।
इन सब विपरीत(odd) और विषम परिस्थितियों के बावजूद मैं मुम्बई गया और मेरे दिमाग मे एक बात थी कि जो सब कर रहे हैं वो नहीं करना है,कुछ अलग करना है।
"तो अलग क्या करूँ ?" उसके लिए ट्रेनिंग(training) की जरूरत थी जो मैंने दिल्ली(Delhi) में National School of Drama से पूरी की। 3 वर्ष मैंने एक्टिंग की पढ़ाई की वहाँ पर और समझा कि इस व्यक्तित्व(Personality) में मुझे किस तरह की एक्टिंग को जरुरत है जिससे लोगों को प्रभावित(Impress) कर सकूँ।

Pic Credit:- Google

आपको बता दूँ कि आप जो भी काम करें उसमें एक्सपर्ट होना बहुत जरूरी है। किसी चीज को बारीकी से जानने और समझने के लिए ट्रेनिंग की और एक्सपर्ट्स के अनुभवों की जरूरत होती है।

इन सबके बाद पहुँच गया मैं मुम्बई। जब-जब काम माँगने जाता, तो यही सुनने को मिलता कि पहले हुलिया तो देख अपना। और बात भी सही थी क्योंकि उस समय तक हीरो(Hero) की पर्सनालिटी को अलग ही रूप में समझा जाता था। लेकिन मैं आत्मविश्वास से भरा हुआ था अपनी ट्रेनिंग की वजह से और मुझे अपनी ड्राफ़्ट के बारे में पता था। मुझे विश्वास था कि आज नहीं तो कल,देर-सबेर कुछ न कुछ तो होगा ही और मेरा भी नम्बर आएगा।

मैंने कभी खुद को समय के बन्धन में नहीं बाँधा कि 2साल, 5 साल कोशिश करूँगा, अगर हुआ तो ठीक नहीं दूसरे क्षेत्र में करियर बना लूँगा। इसीलिए आप भी कभी खुद को टारगेट में मत बाँधिये।

जिस चीज का जुनून होता है उसे दिलाने के लिए पूरी क़ायनात एक जुट हो जाती है,लेकिन आपको उसके लिए ज़िद्दी बनना पड़ता है। आपको कई सारे बलिदान(Sacrifices) देने पड़ते हैं,क्योंकि ये आपने चाहा है। परीक्षा देनी पड़ती है। जितना बड़ा लक्ष्य होगा उतनी बड़ी परीक्षा देनी पडेगी। आसान काम नहीं है। अगर छोटे-छोटे लक्ष्य बनायेंगे तो छोटों में ही निपटारा हो जाएगा। हमेशा अपने आप को बड़ा लक्ष्य दो और उसके लिए खुद को असुविधाजनक(Uncomfortable) zone में डालो। असम्भव को सम्भव करने का जुनून होना चाहिए। आज जो दुनिया मे इतने सारे एक्सपेरिमेंट हुए हैं सारे के सारे पागलपन की हद तक पहुँचे हुए जुनून की वजह से ही हुये हैं।

जब आप कुछ करते हैं तो असफल भी होते हैं लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वो असफलताएँ बेकार हो गयीं। वो असफलताएँ भी आपको कुछ न कुछ सिखा देती हैं जो आपकी सफलता की सीढ़ी बनता है।

तो जब हम लोग मुम्बई आये,हमें पता था कि हमारे पास पर्सनालिटी नहीं है, हमारे पास बैकअप नहीं है। हमारे दादा-परदादा इंडस्ट्री में नहीं हैं। इसलिये आम लोगों के बीच घुसे रहते थे,उनके अनुभवों को सुनते थे, उनका अवलोकन(Observe)करते थे। लगभग 10-12 सालों तक मैंने सिर्फ़ 5-10 सेकंड के ही रोल किए लेकिन अच्छी बात ये थी कि मैं हमेशा लोगों के बीच ही रहता था। और तब एहसास हुआ मुझे कि तरह-तरह के लोग हैं लेकिन हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक ही तरह की एक्टिंग होती है।
दुनिया मे लाखों करोड़ों लोग हैं और सब अलग-अलग स्वभाव,चाल-ढाल के हैं ,लेकिन हमारी इंडस्ट्री में तो सिर्फ एक ही तरह की एक्टिंग हो रही है,तब मुझे एहसास हुआ कि अब मैं जो भी रोल करूँगा उसमें इन्हीं में से किसी की छाप होगी। जैसे बाला साहब ठाकरे, मंटो, गणेश गायतोंडे इत्यादि। तो ये कब हुआ जब मैं लोगों के बीच रहा ,उन्हें समझा। ये एहसास मुझे तब हुआ जब मुझे सफलतायें मिलने लगीं तकरीबन 15 साल बाद।

तो जो आपका संघर्ष का समय होता है वही आपका सुनहरा अवसर होता है क्योंकि उस समय लिए गए अनुभव को ही आप अपनी सफलता में लगाकर उसमें निरन्तरता बनाये रखते हैं। एक बार सफल होने के बाद आपको संघर्ष के दिनों में लिए गए अनुभवों को दुबारा से जीने का मौका नहीं मिलता। इसलिए आज मैं सोंचता हूँ कि जो मैंने 10-15 साल बिना काम के गुजारे वो आज मेरे काम आ रहा है और यही कारण है कि लोग मेरे निभाये गए किरदारों से खुद को जोड़ पाते हैं। और मैं समझता हूँ कि एक अभिनेता के तौर पर यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।

ये बात सत्य है कि संघर्ष के दिन आसान नहीं होते क्योंकि मैंने तो उन दिनों की यादों और अनुभवों को सिर्फ 5 मिनटों में बयाँ कर दिया परन्तु उन दिनों की मैंने जिया है तो उसका एहसास भी मुझे ही सबसे ज्यादा है।

जाहिर है संघर्ष के दिनों में त्याग भी बहुत करने पड़ते हैं। अरे भाई जब खुजली आपको है तो मिटानी भी खुद ही पड़ेगी। आज जो आप हैं आपने बनना चाहा था और अगर आपके अन्दर निराशा आ रही है तो आप तो कहीं शिकायत भी नहीं कर सकते क्योंकि बड़े लक्ष्य की खुजली भी आपको ही थी।

तो जब 10-12 साल यूं ही बीत गए 5-10 सेकंड के किरदारों में तो मुझमें भी निराशा के भाव आने लगे,कि आगे कुछ हो पायेगा या नहीं, बड़ा काम मिलेगा या नहीं वगैरह-वगैरह।
मेरी माँ से पत्रों के जरिये बातचीत होती थी उन दिनों। जब माँ को एहसास होने लगा कि मैं टूट रहा हूँ तो वो पत्र के अंत मे एक लाइन जरूर लिखती थीं कि, "12 साल में तो कचरे के दिन भी बदलते हैं ,तू तो इंसान है तो तेरे दिन भी बदलेंगे"।

तो आपको इस तरह की प्रेरक( motivational) पँक्तियों, कविताओं, कहानियों पर विश्वास रखना होगा क्योंकि यही आपके संघर्ष के दिनों में आपकी सबसे बड़ी साथी होती हैं और आपको अंदर से मजबूती देती उन दिनों को पार करके अपने लक्ष्य को पाने में।

मैं बुढ़ाना गाँव, जिला मुजफ्फरनगर से ताल्लुक़ रखता हूँ। उस वक़्त ज्यादातर हम लैम्पों में ही पढाई करते थे क्योंकि लाइट तो मुश्किल से घण्टे भर के लिए आती थी। हमारे लिए दिल्ली मुम्बई जैसे बड़े शहर हौव्वा थे। जब मैं मुम्बई आया था 10-15 दिन तो घर से बाहर ही नहीं निकला इस शहर की रफ्तार देखकर, मन मे ख़्याल आता था कि पकड़ पाउँगा इस रफ़्तार को ? क्या मैं चल सकूँगा इस रफ़्तार के साथ? तो इस तरह के डर थे मन के किसी कोने में।

लेकिन मैं ऐसी जगह आ चुका था कि वापस नहीं जा सकता था। वापस जाने का मतलब था खुद पर और अपने सपने पर तोहमत लगवाना। यार-दोस्त ,रिश्तेदार सब यही कहते कि आ गए वापस,हमने तो पहले ही कहा था कि शक़्ल देख ले अपनी।
तो इन सब डरों की वजह से सोंच लिया था कि अब जो भी जीना-मरना है वो मुम्बई में।सफलता अगर 30 साल बाद भी मिलेगी उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए,ये मैंने सोंच लिया था।

सफलता की कोई तारीख नहीं होती। आप जिस भी क्षेत्र में हों, जुनून के साथ काम को करते रहिये। समय के साथ आपको उसकी बारीकियाँ समझ मे आती हैं जो आपकी सफलता में सहायक होती है और उसी क्षेत्र में नई सम्भावनाओं को तलाशने में मदद करता है और यही होता है आपका अनुभव।
जैसे एक दर्जी चाहे तो हजार तरह के पैंट बना सकता है और अच्छी कमाई कर सकता है,उसके लिए उसके अंदर अपने काम के प्रति विश्वास, जुनून, नया सीखने और प्रवीणता(Perfection) की ललक होनी चाहिए।

थोड़े में ज्यादा समझिये और जुट जाइये जुनून से अपने लक्ष्य को पाने के लिए।

My best wishes to all of you.

Friends, If you like this post,Kindly comment below the post and do share your response. Thanks for reading:)

You may also like:-

नारी का तुम सम्मान करो।

6 comments:

Rishabh Sachan said...

Nice

Rishabh Sachan said...
This comment has been removed by the author.
Nitish Tiwary said...

बहुत बढ़िया। नवाज़ भाई का संघर्ष हर युवा के लिए प्रेरणास्रोत है।

Rishabh Sachan said...

धन्यवाद नीतीश भाई

Manoj dwivedi said...

Rishab sachan , मेरे भाई!!
आपका ब्लॉग का हरा रंग टेम्पलेट बेहतर चुनी है बहुत आकर्षक है,
और नवाजुद्दीन की पोस्ट को बहुत अच्छा लिखा है,भाई मैं भी अपने ब्लॉग के लिए आपसे कुछ सीखूंगा।

Rishabh Sachan said...

धन्यवाद मनोज भाई,जब भी कोई आवश्यकता हो 8299784653 पर व्हाट्सएप्प कर दीजिएगा।

और अपने blog का लिंक भी साझा कीजिये।

Is Nivea Cream best for all types of skin ?

Sachan.Rishabh   Best and Budget cream with high results!! See all the differences. Reviewed in India on 27 December 2...