किसान - एक योद्धा या विषय भोगी

चारों तरफ शोर मचा हुआ है किसान का।
हाय किसान!उफ़ किसान! हे किसान!

सभी को हमदर्दी होती है असहाय व्यक्ति से और यही होता है जब मुद्दा जुड़ा हो किसान भाइयों से लेकिन कोई भी अपने जीवन मे असहाय को तो झेल सकता है लेकिन असहाय होने का ढोंग करने वाले को नहीं झेल सकता है।


Pic Credit- Google

Farmer

अब इसे ढोंग कहें या उसका विश्लेषण करें तब ही कुछ सामने आ सकता है।

बहुत ही बारीक विश्लेषण करेंगे थोड़ा विस्तार देने के बाद।

किसान भाइयों से ही इतनी हमदर्दी क्यों होती है हमें? किसी उद्योगपति, व्यापारी, नौकरीपेशा ,कामगार इत्यादि से क्यों नहीं होती ? इन सभी का नाम आते ही हमारे ह्रदय में प्रतिशोध की ज्वाला प्रज्ज्वलित हो जाती है।

इसके दो प्रमुख कारण हैं:- 1- पहला कारण ये है कि इंसानी स्वभाव ही ईर्ष्यालु प्रकृति का होता है और बहुत ही विरले लोग इससे अछूते रह पाते हैं। आप सभी जानते हैं कि ईर्ष्या के क्या क्या कारण हो सकते हैं।
सभी चाहते हैं कि परिवारीजन, मित्रगण और पड़ोसी जीवन मे उन्नति करें,धन-सम्पदा अर्जित करें लेकिन जैसे ही वो हमसे ऊपर जाने लगते हैं ,हमारे अंदर की ईर्ष्यालु प्रकृति जागृत होने लगती है। फिर उन्हीं लोगों को हम नीचे गिराने की जुगत लगाते हैं या उनके स्वयं नीचे गिर जाने पर आनंदित महसूस करते हैं।
इस बात पर कोई कहे कि मेरे साथ ऐसा नहीं है तो ये नितांत झूठ है। केवल ईर्ष्या का प्रतिशत कम अधिक हो सकता है लेकिन ईर्ष्या न हो ये सम्भव नहीं।
बिल्कुल यही होता है किसानों के सम्बन्ध में। हर कोई चाहता है कि किसान ऊपर उठें लेकिन वर्षों से उनकी स्तिथि में अधिक बदलाव नहीं है तो सबको उनसे सहानुभूति है लेकिन दूसरी ओर जो किसान उच्च स्तर को प्राप्त कर चुके हैं उनसे व्यक्ति स्वयं ही ईर्ष्या करने लगता है अब इस बात को कोई स्वीकारे या न स्वीकारे। 
ईर्ष्या अधिकतर आसपास के लोगों से होती है क्योंकि दूर के व्यक्ति से कोई विशेष प्रयोजन नहीं होता है।

2- दूसरा कारण ये है कि ज्यादातर किसानों की स्तिथि में अधिक बदलाव नहीं है और इस कारण से हमलोग मानने लगते हैं कि उनपर अत्याचार हो रहा है। 
हम ये मानने को तैयार नहीं होते कि अपनी स्तिथि का किसी सीमा तक किसान स्वयं जिम्मेदार है।

किसान एक आलसी मजदूर से अधिक कुछ नहीं जो बिना दिमाग का उपयोग किये हुए एक नियत ढर्रे पर लगातार चलते हुए ,स्वयं को निराश्रित सिद्ध करने में समय व्यर्थ करने में विश्वास रखता है।

मेरे इस कथन से कई लोगों के ह्रदय में मेरे लिए तीखे व्यंग्यबाण छोड़ने व गालियों से शुशोभित करने की अभिलाषा जन्म ले रही होगी । यदि ऐसा कुछ हो रहा है तो बिन्दु एक को दुबारा से आत्मसात करते हुए पढ़ें ,आपका ह्रदय स्वयं ही शांत हो जाएगा।

किसान को आलसी मजदूर कहकर मैंने बहुत से लोगों की भावनाओं को भड़का दिया है लेकिन मैं अपनी बात पर अडिग हूँ। ये बात प्रत्येक किसान पर लागू नहीं होती लेकिन 80% से अधिक किसानों पर लागू होती है।

खेती किसानी में हर समय कुछ न कुछ नहीं होता है। उस समय को किसान भाई लेटकर आनन्द लेने में व्यतीत करते हैं।ये स्वयं व्यापारी बनने के विषय मे नहीं सोंचते हैं ।व्यापारी से मतलब स्वयं ग्राहकों तक पहुंचने की कोशिश नहीं करते। दूध साग सब्जी इत्यादि में समय नहीं देना चाहते। खेती-बाड़ी में भी एक नियत ढ़र्रे को अपनाये हुए हैं और उसमें कोई विशेष बदलाव नहीं करना चाहते तो कैसे बढ़े आय ??

अगर मनमाने दाम दिए जाने लगें तो यही मध्यम वर्ग जो आज किसान हितैषी होने का ढोंग कर रहा है, हाहाकार मचा देगा कि खाने के लाले पड़ गए हैं।

इस स्तिथि के विषय मे किसान भाइयों को विचार करने की जरूरत है। कोई उनका सगा नहीं है यहाँ तक कि कोई किसी का सगा नहीं है। 
लोग कहते हैं कि सरकारें उद्योगपतियों की सगी होती हैं ,यदि ऐसा हो तो कोई भी उद्योगपति कभी धरातल पर ही न आये बाकी उद्योपतियों के हाल सबको पता है। कुछ सहूलियतें मिलती है जिस तरह से सभी को उनके स्तर के अनुसार सहूलियतें मिलती हैं लेकिन ये आप पर निर्भर करता है कि आप उन सहूलियतों को कैसे उपयोग करते हैं।

किसानी के साथ साथ आपको अन्य विकल्पों पर भी सोचना होगा और उनका क्रियान्वयन भी करना होगा।।
एक नौकरीपेशा, एक उद्योगपति, एक कामगार, निरन्तर काम करता है तब धन कमाता है और किसान भाइयो यदि झूठी सहानुभूति प्राप्त हो भी जाएगी तो भी उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि आपको स्वयं ही अपनी स्तिथि को बदलना होगा अन्य लोग तो केवल सहानुभूति ही दे सकते हैं। सरकार भी योजनाएं ही बना सकती है। आंशिक मदद कर सकती है लेकिन उससे जीवन की समस्या का हल नहीं है।

अब आते हैं इस विषय पर कि किसान वास्तविक असहाय है या फिर असहाय होने का ढोंग कर रहा है।

मेरे अनुसार वो सिर्फ़ ढोंग कर रहा है।

उन्हें पता है कि उन्हें सहानुभूति तो मिल ही जाएगी लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि सहानुभूति के सहारे चूल्हे-चौके नहीं चला करते।

वो चाहते हैं कि कोई उन्हे मक्कार न कहे,कामचोर न कहे और इसलिए हर जगह अपने कष्टों को बढ़ाचढ़ा कर प्रदर्शित करते हैं।

क्या कोई ये बता सकता है कि उसके जीवन मे कष्ट नहीं है या फिर जो काम वो करते हैं उसमें कष्ट नहीं होता या फिर जो काम वो करते हैं उसमें आराम ही आराम होता है??

किसान रात में खेतों में सोता है, पानी लगाता है इस बात को खूब बढ़ाचढ़ाकर पेश किया जाता है कई अन्य पेशे ऐसे हैं जिनमें जीवन-मृत्यु का डर हमेशा बना रहता है ।हम उन्हें सिर्फ़ सम्मान दे सकतें हैं ,सहानुभूति दे सकते हैं लेकिन उससे उनकी निजी समस्याओं का हल नहीं होगा। इसके लिए उन्हें स्वयं कदम आगे बढाने होंगे।

कोई भी नियम कानून किसान से बड़ा नहीं है लेकिन किसान को भी समझना होगा कि सहानुभूति के सहारे उसका जीवन सुखप्रद नहीं हो सकता।

सभी किसान भाइयों से अनुरोध है कि आगे बढिये ,अन्य विकल्पों पर विचार कीजिये उनके क्रियान्वयन कीजिए और अपने जीवन को सुखमय बनाइये।


Friends, If you like this post,Kindly comment below the post and do share your response. Please don't forget to follow and subscribe this blog. Thanks for reading:)

Ram- In every feeling of life.

जीवन के हर भाव मे 'राम' सभी लोग दिन भर प्रभु श्री राम को किसी न किसी रूप में याद करते ही हैं और यही हमारे मुक्ति का साधन बनेगा। आइए ...